पुस्तक योगामृत से
जन्माद्यस्ययतः। वेदांत दर्शन अध्याय 1-1-2
ईश्वर सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय किया करता है।
अतः वह निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मादि गुणों वाला होता है।
भूतस्य जातः पतिरेकऽआसीत।
यजु• 13• 4• ।।
उत्पन्न हुए सम्पूर्ण जगत् का प्रसिद्ध स्वामी एक ही चेतनस्वरूप था, जो सब जगत् के उत्पन्न होने से पूर्व वर्तमान था।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमाम्। उपरोक्त।
वह अकेला ही इस भूमि और सूर्यादि को धारण कर रहा है।
{इसलिए ईश्वर अद्वितीय है}
यजुर्वेद अध्याय 40 का 8वां मंत्र स्पष्ट करता है कि--->
[सपर्य्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं]
वह खंब्रह्म, शुभ्र, अतुल्य, भासमान और अकायम्- काया रहित है।
नेत्रादि इन्द्रियों के निकाय रहित- वह शरीर रहित है।
न मृत्यवेऽवतस्थे कदाचन। ॠग्वेद 10- 48- 5-
ईश्वर कभी भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता और न कभी जन्म ही लेता है।
न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यश:।
ॠग्वेद 32- 3-
निराकार परमपिता परमात्मा की कोई प्रतिमा नहीं हो सकती है।
सदैव ध्यान रखना चाहिए कि दो विरोधी गुण नहीं होते- *परमात्मा निराकार है साकार नहीं हो सकता है।
ईश्वर जीव रूप (योनि) में अवतार धारण करने वाला नहीं हो सकता है।
अणोरणीयान महतो महीयान।
वह परमात्म-तत्व अणु से भी अति सूक्ष्म है।
मेरी इस पुस्तक योगामृत में ईश्वर सम्बन्धित अनेकों प्रमाण भरे पड़े हैं।
जो बिना जाने ही मानने लगते हैं उनसे दूर ही अच्छा।
जो यह मानते हैं कि ईश्वर जन्म भी लेता है-
यह ऐसी बात हुई
जैसे चक्रवर्ती राजा को सब राज्य की सत्ता से छुडाकर एक छोटी सी झोंपड़ी का स्वामी मानना। ऐसा मानने वाले समझो-जिसके आधीन सारी सृष्टि है उसे किसी माँ के गर्भ में धारण करवाकर पैदा करना कितना बड़ा अपमान है। ऐसे आँखों के अंधों- ओ3म् खम्ब्रह्म। यजुर्वेद अ• 4०- मंत्र 17
जो आकाशवत् व्यापक होने से खम् और सबसे बड़ा सर्वोच्च विराजमान होने से ईश्वर का नाम ब्रह्म है।
ज्ञान की आखों को बंद न रखो परमेश्वर को भी जन्म देकर इतना अपमानित न करो।
यह सब ऊंट पै टांग रखना छोड़ कर वेदों की ओर लोटो।
जो जैसा है उसको वैसा ही यथावत् मानना ज्ञान और अन्यथा जानना कोरी अज्ञानता है। जैसे अग्नि को जल समझना।
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